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मै और मेरी कलम

दिन गिने चुने मैं क्या बोलूँ  जीवन के खाते मिलती है क्या रंग बताऊँ जीवन का  पग पग पर रंग बदलती है  लिखती है क़लम मेरी सब कुछ  पर तू मुझे कभी नहीं लिखती है ।   मैं हूँ कैसा, मैं हूँ किसका  सारांश मेरा किसके जैसा  मेरा अंत है क्या, प्रारब्ध कहाँ ?  जीवन में मुझको लब्ध है  क्या जीवन में खोया पाया क्या  ये खाता ही लिख डाल कभी  कितने जोड़े कितने छूटे  क्या अपने हैं ये लोग सभी  कुछ बोल तो क्या तू कहती है  तू मुझे कभी नहीं लिखती है ।   लिख डाल हुनर मेरा है क्या  या घुला ज़हर जीवन में क्या  लिख- दिया है क्या अब तक मैंने  या पिया ज़हर कितना मैंने  मुझ पर कितना है क़र्ज़ चढ़ा  और कितना मेरा मर्ज़ बड़ा  कितना सच्चा कितना झूठा  और कितना मेरा दर्प बढ़ा  लिख मुझको जितना सुनती है  तू मुझे कभी नहीं लिखती है  कितना है सच जो बुनता मैं  है स्वप्न या मिथ्या मनतरंग  कुछ बदला मैंने ग़लत कहीं  या रह गया बन के इक उमंग  है साथ मेरे संगी कोई  या बस मतलब की यारी है...

मेरी बिटिया

तुम जानती हो कौन हो !  तुम हो हवा, तुम हो घटा  तुम सृष्टि का वरदान हो  तुम कल भी थे तुम आज हो  तुम ही तो मेरा मान हो  तुम रक्त हो तुम साँस हो  तुम आस हो विश्वास हो  तुम हो मेरा चातुर्य भी  तुम ही तो मेरा मौन हो  तुम जानती हो कौन हो !  तुम में विगत, आगत में तुम  तुम अश्रु में , स्वागत में तुम  तुम हो बसंत, बहार हो   सावन की पहली फुहार हो  तुम से है जग चंचल बना  तुम बिन मैं शोकाकुल बना  तुम काल का हर पल बनी  तुम ही तो मेरा आन हो  तुम जानती हो कौन हो !  तुम हो झलक भविष्य की  तुम काल का परिदृश्य हो  तुम यत्र हो तुम तत्र हो  तुम ही हो हाँ सर्वत्र हो  तुम नीर सी कोमल जो हो  तो लौह सी हो सख़्त भी  तुम स्वर्ण हो सम्पत्ति  हो आगत की तुम सिरमौर  हो तुम जानती हो कौन हो !  तुम बन सको जो तो बनो  तुम अग्नि का पर्याय हो  तुम ढल सको जो तो ढलो  ज्यों म्यान का तलवार हो  दुर्बल की शक्ति तुम बनो तो  ज्ञान की साक्षात् भी  मेघा सी क...

मै भारतीय मजदूर

आज कह रहा हूँ व्यथा अपनी व्यक्ति मै अस्तित्वहीन कंचन की चमक बनती है मुझे दृष्टीहीन लक्ष्मी के चुड़ीयों की खनक बनाती है मुझे बहरा इंद्र की सत्ता हराम नहीं अवसर है सुनहरा चाहता हूँ दो जून की रोटी तन पर एक कपडा मुन्ने की पढायी और वो तो कहती है मुझे कुछ नहीं चाहिये बीत गया एक जमना यही सोचते सोचते शयद कुछ मिलेगा अंधेरे को टटोलते लेकिन ये सोच है बेईमानी कही चलनी मे रुकता पानी छोर कर कर्ज़ विरसत मे चला जाउंगा एक दिन दूर मै भारतीय मजदूर मै भारतीय मजदूर

टेरेस का फूल

टेरेस का फूल अरे सुनो ! कहाँ हो आजकल, दिखते नहीं ! याद हूँ मै? या पहचानते नहीं ! दिन बहुत हो गए तुम्हे देखे कैसे दीखते हो अब मै तो वैसा ही हूँ तुम कैसे हो अब ! कल यहाँ बारिश हुई थी और मै भीगा था तुम भी भीगे थे ! या अब नहीं भीगते ? तुम्हारे हाथ से जब पानी पाता था आनंद उसका अलग आता था अब तो बस भीग लेता हूँ पर प्यास नहीं बुझती पहचाने ? मै ही तो हूँ तुम्हारे टेरेस का वो फूल ही तो हूँ ! मै तो आज भी खिलता हूँ देखने को की तुम आये तो नहीं ! रोज मुरझा जाता हूँ पर तुम दिखते तो नही! हाँ सुनो ! अब वो नन्ही दोस्त भी नहीं आती चहचहाने की वो आवाज नहीं आती याद आया ? हाँ ! वो गौरैया , वही ! कटोरे का पानी सूख गया होगा, शायद या अब आशियाना बदल लिया होगा, शायद ! बहरहाल ! रोज खिलता हूँ इस ख्याल से की कभी तो आओगे, शायद ! प्यार से मुझे सहलाओगे, शायद ! आखिर में एक और खबर देनी थी तुम्हे दस्तूर चले जाने का, देना था तुम्हे सब कुछ तो था फिर भी सूख गया वो काटो वाला फूल, मेरा पडोसी ! अब नहीं रहा !

सन्नाटा

क्यों हो जाता है कोई मौन? क्यों होता है सन्नाटा ? क्यों लगता कष्टदायीं जीवन? जब टूटते हैं सपने शीशे की भाँति जब बिखरते है सपने जीवन के जैसे बिखरते हैं टुकड़े शीशे के क्या हो सारांश स्वप्न का? बनना, टूटना, पूरा होना या कुछ और! इतिवृत्ति तो है टूटने के बहरहाल ! शीशे की सी चमक होती है स्वप्न में जब कि सुना है यथार्थ सपनो का शीशे से साफ़ दिखता है किंतु है कुछ अंतर शीशे में और स्वप्न में चमकता है शीशा, टूटने के बाद भी कई रूपों में, कई हिस्सों में वही चमक जो पहले थी टूटे जबकि दोनो एक बात और क्या बिक सकते हैं टूटे सपने में? जैसे बिकते टूटे शीशे क्यों नहीं करता है मानव ऐसा कोई एक उपक्रम जिस से बन सके फिर से टूटे सपने नहीं ना ! फिर कैसा संताप ? कैसा विलाप? कैसा मौन और कैसा सन्नाटा ? स्वप्न टूटे या काँच नहीं टूटेंगे तो कहाँ से होगा पुनर्निर्माण? आवश्यक है स्वप्न पुनर्निर्माण के लिए जैसे आवश्यक है किरण मिटाने को अंधेरे का अस्तित्व क्यों होता है सन्नाटा ? जब आती है आवाज़ टूटने की ? यदि ज़रूरी है पुनर्निर्माण तो बाँटे हम सन्ना...

युवा

रोती हुयी जिंदगी, हसते हुए लोग जी रहे हैं, हंस रहे हैं, एक दूसरे पर किन्तु क्या कोई हँसता है, रोता है स्वयं पर, जैसे मै दम तोड़ती महत्वाकांछा चाहू ओर घिरता तम विकट खोज, जाने कहा छुप गया है प्रकाश पुंज जिंदगी का कहा तक करूँ संघर्ष? टूटता आत्मविश्वास, टूटती हिम्मत टूटता दम हूँ दिग्भ्रमित भयंकर क्यों? हारती हुयी कोशिश लौटती हुयी आवाज़े बोझिल साँसे बढ़ता कर्ज अवरुद्ध विचार क्यों हो रहा है अविभाजित मन स्वयं से? याद आते गुरु जी के आशीर्वाद माँ की ममता पिता की उम्मीद याद आते स्वप्न जो इन्ही आँखों से देखे किन्तु अब नहीं दिखते बिलखता अतीत लुटता सर्वस्व फिर भी मै कर रहा प्रयास प्रयास !! यही तो है जो मै कर सकता हूँ और शायद कुछ नहीं.

वो चले गए

इस तरह मै जिंदगी से हारा हूँ की अपनी ही नज़र में बना बेचारा हूँ हर चीज मुह चिढाती सी लगती है जिंदगी यूँ खार खायी सी लगती है आँख में आंसू दिल में गम और जुबान बेजबान है बदकिस्मती पूरी किस्मत से मेहरबान है एक सवाल मुझे यूँ परेशान करता है तड़पाता है और हैरान करता है जब वो चले गए तो उनकी याद क्यूँ आती है सूनी शाम आँख क्यूँ भर जाती है क्यों अब अपने कपड़ो में चमक नहीं देखना चाहता ये चेहरा मेरा कोई रौनक नहीं देना चाहता बिस्तर पे खुद को तड़पते पाता हूँ ज्यों किसी का क़र्ज़ मै चुकाता हूँ मै जानता हूँ की तुम लौट के नहीं आवोगी दूर कही किसी और के बाँहों में खो जावोगी हर शाम अब उदास होता है हाथ मलता हुवा सा अहसास होता है हंसी छिन गयी उदास रातो का अब सहारा हूँ इस इस तरह मै जिंदगी से हारा हूँ