मै भारतीय मजदूर

आज कह रहा हूँ व्यथा अपनी
व्यक्ति मै अस्तित्वहीन

कंचन की चमक बनती है
मुझे दृष्टीहीन
लक्ष्मी के चुड़ीयों की खनक
बनाती है मुझे बहरा

इंद्र की सत्ता हराम
नहीं अवसर है सुनहरा
चाहता हूँ दो जून की रोटी
तन पर एक कपडा

मुन्ने की पढायी और
वो तो कहती है
मुझे कुछ नहीं चाहिये
बीत गया एक जमना

यही सोचते सोचते
शयद कुछ मिलेगा
अंधेरे को टटोलते
लेकिन ये सोच है बेईमानी
कही चलनी मे रुकता पानी
छोर कर कर्ज़ विरसत मे

चला जाउंगा एक दिन दूर
मै भारतीय मजदूर
मै भारतीय मजदूर

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