मै और मेरी कलम

दिन गिने चुने मैं क्या बोलूँ 
जीवन के खाते मिलती है
क्या रंग बताऊँ जीवन का 
पग पग पर रंग बदलती है 
लिखती है क़लम मेरी सब कुछ 
पर तू मुझे कभी नहीं लिखती है ।
 
मैं हूँ कैसा, मैं हूँ किसका 
सारांश मेरा किसके जैसा 
मेरा अंत है क्या, प्रारब्ध कहाँ ? 
जीवन में मुझको लब्ध है 
क्या जीवन में खोया पाया क्या 
ये खाता ही लिख डाल कभी 
कितने जोड़े कितने छूटे 
क्या अपने हैं ये लोग सभी 
कुछ बोल तो क्या तू कहती है 
तू मुझे कभी नहीं लिखती है ।
 
लिख डाल हुनर मेरा है क्या 
या घुला ज़हर जीवन में क्या 
लिख- दिया है क्या अब तक मैंने 
या पिया ज़हर कितना मैंने 
मुझ पर कितना है क़र्ज़ चढ़ा 
और कितना मेरा मर्ज़ बड़ा 
कितना सच्चा कितना झूठा 
और कितना मेरा दर्प बढ़ा 
लिख मुझको जितना सुनती है 
तू मुझे कभी नहीं लिखती है 

कितना है सच जो बुनता मैं 
है स्वप्न या मिथ्या मनतरंग 
कुछ बदला मैंने ग़लत कहीं 
या रह गया बन के इक उमंग 
है साथ मेरे संगी कोई 
या बस मतलब की यारी है 
कितनी है मेरी साँस बची 
और कब मेरी बारी है 
तेरी स्याही क्या कहती है 
तू मुझे कभी नहीं लिखती है । 

लिख डाल उन्हें जो अपने हैं 
अंदर और बाहर दोनो से 
लिख डाल नाम उन लोगों का 
खेले जो मुझे खिलौनो से 
जीवनसंगी इक पाया था 
कुछ स्वप्न सुनहरे पाला था 
बस चार क़दम तक साथ चली 
क्या मैंने कुछ कर डाला था 
मेरी कैसी क्या ग़लती है ? 
तू मुझे कभी नहीं लिखती है ।

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