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Showing posts from August, 2017

मै भारतीय मजदूर

आज कह रहा हूँ व्यथा अपनी व्यक्ति मै अस्तित्वहीन कंचन की चमक बनती है मुझे दृष्टीहीन लक्ष्मी के चुड़ीयों की खनक बनाती है मुझे बहरा इंद्र की सत्ता हराम नहीं अवसर है सुनहरा चाहता हूँ दो जून की रोटी तन पर एक कपडा मुन्ने की पढायी और वो तो कहती है मुझे कुछ नहीं चाहिये बीत गया एक जमना यही सोचते सोचते शयद कुछ मिलेगा अंधेरे को टटोलते लेकिन ये सोच है बेईमानी कही चलनी मे रुकता पानी छोर कर कर्ज़ विरसत मे चला जाउंगा एक दिन दूर मै भारतीय मजदूर मै भारतीय मजदूर

टेरेस का फूल

टेरेस का फूल अरे सुनो ! कहाँ हो आजकल, दिखते नहीं ! याद हूँ मै? या पहचानते नहीं ! दिन बहुत हो गए तुम्हे देखे कैसे दीखते हो अब मै तो वैसा ही हूँ तुम कैसे हो अब ! कल यहाँ बारिश हुई थी और मै भीगा था तुम भी भीगे थे ! या अब नहीं भीगते ? तुम्हारे हाथ से जब पानी पाता था आनंद उसका अलग आता था अब तो बस भीग लेता हूँ पर प्यास नहीं बुझती पहचाने ? मै ही तो हूँ तुम्हारे टेरेस का वो फूल ही तो हूँ ! मै तो आज भी खिलता हूँ देखने को की तुम आये तो नहीं ! रोज मुरझा जाता हूँ पर तुम दिखते तो नही! हाँ सुनो ! अब वो नन्ही दोस्त भी नहीं आती चहचहाने की वो आवाज नहीं आती याद आया ? हाँ ! वो गौरैया , वही ! कटोरे का पानी सूख गया होगा, शायद या अब आशियाना बदल लिया होगा, शायद ! बहरहाल ! रोज खिलता हूँ इस ख्याल से की कभी तो आओगे, शायद ! प्यार से मुझे सहलाओगे, शायद ! आखिर में एक और खबर देनी थी तुम्हे दस्तूर चले जाने का, देना था तुम्हे सब कुछ तो था फिर भी सूख गया वो काटो वाला फूल, मेरा पडोसी ! अब नहीं रहा !